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महिलाओं का ईदगाह
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सबसे अलग ईद पर मुस्लिम समाज के पुरूष ही ईदगाह पर जाते ओर नमाज अदा करते हैं। किंतु उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद के चांदपुर कस्बे में एक ऐसा ईदगाह भी है, जहां सिर्फ मुस्लिम महिलाएं ही ईद पर नमाज अदा करती हैं। खास बात यह है कि इस ईदगाह के बारे में बिजनौर जनपद के ही बड़ी संख्या में रहने वालों को जानकारी नही हैं। चंादपुर से बास्टा जाने वाले मार्ग पर स्थित यह ईदगाह नया नहीं है। सौ साल से ज्यादा पुराना है। इसमें छोटी ईंट का बना कुंआ है, जो इसकी प्राचीनता बताने के लिए काफी है। ईदगाह में लगे पेड़ ही काफी प्राचीन है। ईदगाह के संचालक शाहबुुद्दीन बतातें है कि ईदगाह का नाम अहले हदीस है और यह सौ साल से भी ज्यादा पुराना है। वे बताते है कि ईदगाद ढ़ाई बीघा जमीन में स्थित हैं। ईद से क ई दिन पहले कमेटी ईदगाह की सफाई कराती है। ईद से एक दिन पूर्व ईदगाह के चारों ओर कनात लगवाई जाती हंै। इन कनातों के पीछे महिलांए नमाज अदा करती हैं। कनात इसलिए लगवाई जाती है कि महिलांए नवाज के समय पुरूषों के सामने न आए और पर्दा बना रहे। वे बताते हैं कि उनके ह...
विश्व के अजूबों से कम नहीं कालागढ़ डेम
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सबसे अलग विश्व के अजूबों से कम नहीं कालागढ़ डेम उत्तरांचल का रामगंगा नदी पर बना कालागढ़ का डेम विश्व के प्रसिद्ध अजूबों जैसा ही है। इसे एशिया का सबसे बड़ा मिट्टी का डेम होने का सौभाग्य प्राप्त है। डेम एरिया में मैसूर के काबेरी नदी पर बने वृंदावन गार्डन की तर्ज पर विकसित शानदार उद्यान भी है। कालागढ़ से कार्बेट में प्रवेश के लिए एक गेट भी है। इस गेट से प्रवेश कर कार्बेट के वन्य प्राणियों का भी आसानी से अवलोकन किया जा सकता है। यहां से कंडी मार्ग से एक और कोटद्वार तो दूसरी ओर रामनगर भी जाया जा सकता है। शिवालिक पहाडिय़ां पर्यटकों को सदैव अपनी और आकर्षित करती रही हैँ। दिल्ली से लगभग २५० किलो मीटर की दूरी पर रामगंगा के तट कालागढ़ स्थित है। दिल्ली से मेरठ बिजनौर होकर लगभग पांच घंटे में कालागढ़ पंहुचा जा सकता है। कालागढ़ में सिंचाई विभाग के कुछ रेस्ट हाउस और प्रशिक्षण केंद्र हैं। डेम बनने के समय कर्मचारियों और अधिकरियों के लिए कुछ कालोनी बनी थी। रिजर्व वन होने के कारण डेम बनने के बाद कालागढ़ की भूमि का...
एक जरा सा मजाक
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एक संस्मरण एक जरा सी मजाक अशोक मधुप मजाक -मजाक ही होती है। हल्की फुल्की। मौज मस्ती की। किंतु कई बार मजाक गंभीर भी हो जाती हैं। ऐसी मजाक इतिहास बनती हैं। एक ऐसी मजाक मेरे वर्धमान कॉलेज की पढ़ाई के दौरान हुई। वह मजाक कालचक्र पर अपने निशान बना गई। कॉलेज इस मजाक और उसके योगदान को कभी नहीं भुला पाएगा । सऩ 19 68 में मैंने वर्धमान कॉलेज में बीए में प्रवेश लिया।कुछ दिन ठीक ठाक चला। इंटर मैंने प्राइवेट किया था। हाईस्कूल रेगुलर था। इसके तीन साल के बाद का ये माहौल बिल्कुल नया था। सुखद- आनन्ददायी । दस बजे के बाद कक्षांए होतीं। मैं झालू का रहने वाला हूूू। हम झालू - हल्दौर के साथी सवेरे ट्रेन से बिजनौर आते । शाम को ट्रेन से अपने घर झालू चल जाते। तब तक झालू से बिजनौर का रास्ता कच्चा था। आने जाने का ट्रेन के अलावा कोई और साधन न था। दस से चार बजे तक क्लास होतीं। उसके बाद खाली। ट्रेन शाम छह बजे थी। सो इतने शहर घूमना। मौज मस्ती करना ही रहता। कॉलेज में नए दोस्त बन रहे थे। मैं भी देहात के माहौल से निकल कर शहर में ढलने में लगा था। एक दिन पता चला कि अपने कॉलेज...
श्री जंभेश्वर तपोवन आश्रम धाम पर 18 को विश्श्नोई समाज करेगा पूजा − अर्चन
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श्री जंभेश्वर तपोवन आश्रम धाम पर 18 को विश्श्नोई समाज करेगा पूजा − अर्चन बिजनौर मंडावर मार्ग पर मुहम्मदपुर देवमल में विश्नोईयों का मंदिर है। मंदिर गांव से लगभग छह−सात किलो मीटर दूर जंगल में हैं। यहां प्रत्येक साल होली के बाद चेत्र अमावस्या को मेला लगता है। इस बार चैत्र अमावस्या 18 मार्च की है। जिले से बड़ी तादाद में श्रद्धालू यहां आते। गुरू श्री जंभेश्वर महाराज जी द्वारा लगाए खेजड़ी वृक्ष पर श्रद्धालु कलावा बांधकर अपनी मन्नतें मांगते है । सवेरे हवन होता है। उसके बाद श्रद्धालुओं के लिए भंडारा होता है । श्रद्धालु भंडारे में प्रसाद ग्रहण करते हैं । कुछ यहां गुरू जी के कथनानुसार पौधे भी रोपतें हैं। मान्यता है कि श्री जंभेश्वर महाराज राजस्थान के समराथल धोरा से चलकर नदी किनारे मोहम्मदपुर देवमल के जंगल में अपनी जमात के साथ सन 1533 ई. में आकर यहां रुके। तब यह वन क्षेत्र था। यह स्थान नदी किनारे होता था। गुरु महाराज ने अपने रूकने के दौरान यहां अपने हाथों से खेजड़ी का वृक्...
बरमपुर, जहां स्वर्गारोहण को जाते पांडव दस दिन रूके
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बरमपुर, जहां स्वर्गारोहण को जाते पांडव दस दिन रूके अशोक मधुप वरिष्ठ पत्रकार बिजनौर जनपद का आज का गांव बरमपुर का बहुत ही एतिहासिक है, इसके बावजूद ये आज तक इतिहास में जगह नही बना पाया।जनपदवासी ये भी नही जानते कि यहां कभी पांडवों के कुल गुरू कृपाचार्य का आश्रम था। जानकारों के अनुसार बरमपुर का पौराणिक नाम ब्रह्मपुर है। यहां वैदिक काल में ब्रह्मऋषि आश्रम था। ब्रह्मपुर बोलचाल की भाषा में बरमपुर हो गया। बरमपुर के प्रसिद्ध विद्वान यशपाल सिंह आर्य के अनुसार बरमपुर फारसी भाषा का शब्द है। उर्दू और फारसी में ब्रह्मपुर नमो न लिखा जा सकता है और नहीं बोला जा सकता है । 15 ईसवीं में इस क्षेत्र पर मुगलों का पूर्ण अधिपत्य स्थापित हो गया। उसके बाद ब्रह्मपुर को बरमपुर बोलना शुरू किया । मान्यता है कि महाभारत काल में यहां हस्तिनापुर राज परिवार के राज गुरु कृपाचार्य का आश्रम था। यह आश्रम जनपद बिजनौर उत्तर प्रदेश जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर उत्तर दिशा में तथा नजीबाबाद तहसील मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर पश्चिम दक्षिण दिशा में ...