एक जरा सा मजाक
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एक संस्मरण
एक जरा सी मजाक
अशोक मधुप
मजाक -मजाक ही होती है। हल्की फुल्की। मौज मस्ती की। किंतु कई बार मजाक गंभीर भी हो जाती हैं। ऐसी मजाक इतिहास बनती हैं। एक ऐसी मजाक मेरे वर्धमान कॉलेज की पढ़ाई के दौरान हुई। वह मजाक कालचक्र पर अपने निशान बना गई। कॉलेज इस मजाक और उसके योगदान को कभी नहीं भुला पाएगा ।
सऩ 19 68 में मैंने वर्धमान कॉलेज में बीए में प्रवेश लिया।कुछ दिन ठीक ठाक चला। इंटर मैंने प्राइवेट किया था। हाईस्कूल रेगुलर था। इसके तीन साल के बाद का ये माहौल बिल्कुल नया था। सुखद- आनन्ददायी । दस बजे के बाद कक्षांए होतीं। मैं झालू का रहने वाला हूूू। हम झालू - हल्दौर के साथी सवेरे ट्रेन से बिजनौर आते । शाम को ट्रेन से अपने घर झालू चल जाते। तब तक झालू से बिजनौर का रास्ता कच्चा था। आने जाने का ट्रेन के अलावा कोई और साधन न था। दस से चार बजे तक क्लास होतीं। उसके बाद खाली। ट्रेन शाम छह बजे थी। सो इतने शहर घूमना। मौज मस्ती करना ही रहता।
कॉलेज में नए दोस्त बन रहे थे। मैं भी देहात के माहौल से निकल कर शहर में ढलने में लगा था। एक दिन पता चला कि अपने कॉलेज का परीक्षा केंद्र टूट गया। अब सभी छात्र- छात्राओं को परीक्षा देने आगरा जाना होगा। उस समय यह कॉलेज आगरा विश्वविद्यालय से संबध था। रूहेलखंड विश्वविद्यालय बाद में बना। केंद्र टूटने की सूचना पर सभी छात्र- छात्राओं में बेचैनी फैल गई। आगरा कैसे जांएगे? वहां कहां रूकेंगे? खाने - पीने का कैसे होगा ? लड़कियों और उनके अभिभावकों के लिए यह सूचना ज्यादा चिंताकर थी।
उस समय हमारे सीनियर होते थे। महबूब अख्तर सिद्दीकी। बहुत हंसमुख । मिलनसार। शायद छात्र यूनियन के सचिव भी थे। उनका साथी था नंदा । पूरा नाम याद नहीं। शायद एसएस नन्दा। महबूब भाई ने नऩ्दा से मजाक किया। कहा तेरा नेता बनने का इस समय बहुत मौका है। कॉलेज का परीक्षा केंद्र टूटा है। सब परेशान हैं। छात्रा और उनके अभिभावक सबसे ज्यादा तनाव में हैं। ऐसे में तू भूख हड़ताल कर दें। हम तेरे साथ हैं। दो तीन दिन की बात है। कॉलेज परीक्षा केंद्र बन ही जाना है। तू सबका हीरो बन जाएगा। एक बड़ा छात्र नेता। देख गुलजारी लाल नंदा प्रधान मंत्री रहे। ऐसे ही थ्रोड़े ही बने हैं। इन्होंने भी संघर्ष किया है। तू भी तो नंदा है।नंदा के दिमा्ग में बात घर कर गई। पुरानी बिल्डिंग में प्राचार्य कक्ष के बाहर ईंट रखीं थीं। शायद वे किसी निर्माण के लिए आई थीं। नंदा को माला पहनाकर उन्हीं पर बैठा दिया गया। कुछ ही देर में दो औार साथी श्याम सुंदर और रावेंद्र कुमार भी भूख हड़ताल पर बैठ गए। श्याम सुंदर का पूरा नाग शायद श्याम सुंदर शर्मा था।
सूचना पर देवेंद्र बक्शी आ गए। वे छात्र संघ के अध्यक्ष होते थे। शामियाना लग गया। छात्र संघ जिदांबाद, केंद्र नहीं रहेगा। कोई भी मजबूरी हो मांग हमारी पूरी हो ,के नारे कॉलेज में गूंजने लगे। केंद्र टूटने से प्राचार्य डा एसआर त्यागी भी क्षुब्ध थे। वे केंद्र टूटने को अपना अपमान मान रहे थे। त्यागी जी बहुत ही विद्वान प्राचार्य और कुशल प्रशासक भी थे।
उन्होंने छात्रों के आदोंलन से विश्वविद्यालय को अवगत कराया। कहा कि केंद्र तोड़कर सभी छात्र- छात्राओं को परीक्षा देने आगरा बुलाना गलत है। आप चाहें तो परीक्षा कराने के लिए बाहर का स्टाफ भेज सकतें हैं।
साथियों का संघर्ष रंग लाया। विश्व विद्यालय को अपना निर्णय बदलना पड़ा। आज नन्दा,श्याम सुंदर कहां हैं , पता नहीं। रावेंद्र जाटान में रहते थे,वे जरूर मिलते रहे। पता चला कि कई साल पहले उनका निधन हो गया।महबूब अख्तर सिद्दीकी बिजनौर कचहरी में वकालत करते हैं। उम्र ने हल्की सी उनकी कमर जरूर झुका दी किंतु आज भी पहले से ही मस्त हैं।
अशोक मधुंप
पूर्व छात्र
अशोक मधुप
मजाक -मजाक ही होती है। हल्की फुल्की। मौज मस्ती की। किंतु कई बार मजाक गंभीर भी हो जाती हैं। ऐसी मजाक इतिहास बनती हैं। एक ऐसी मजाक मेरे वर्धमान कॉलेज की पढ़ाई के दौरान हुई। वह मजाक कालचक्र पर अपने निशान बना गई। कॉलेज इस मजाक और उसके योगदान को कभी नहीं भुला पाएगा ।
सऩ 19 68 में मैंने वर्धमान कॉलेज में बीए में प्रवेश लिया।कुछ दिन ठीक ठाक चला। इंटर मैंने प्राइवेट किया था। हाईस्कूल रेगुलर था। इसके तीन साल के बाद का ये माहौल बिल्कुल नया था। सुखद- आनन्ददायी । दस बजे के बाद कक्षांए होतीं। मैं झालू का रहने वाला हूूू। हम झालू - हल्दौर के साथी सवेरे ट्रेन से बिजनौर आते । शाम को ट्रेन से अपने घर झालू चल जाते। तब तक झालू से बिजनौर का रास्ता कच्चा था। आने जाने का ट्रेन के अलावा कोई और साधन न था। दस से चार बजे तक क्लास होतीं। उसके बाद खाली। ट्रेन शाम छह बजे थी। सो इतने शहर घूमना। मौज मस्ती करना ही रहता।
कॉलेज में नए दोस्त बन रहे थे। मैं भी देहात के माहौल से निकल कर शहर में ढलने में लगा था। एक दिन पता चला कि अपने कॉलेज का परीक्षा केंद्र टूट गया। अब सभी छात्र- छात्राओं को परीक्षा देने आगरा जाना होगा। उस समय यह कॉलेज आगरा विश्वविद्यालय से संबध था। रूहेलखंड विश्वविद्यालय बाद में बना। केंद्र टूटने की सूचना पर सभी छात्र- छात्राओं में बेचैनी फैल गई। आगरा कैसे जांएगे? वहां कहां रूकेंगे? खाने - पीने का कैसे होगा ? लड़कियों और उनके अभिभावकों के लिए यह सूचना ज्यादा चिंताकर थी।
उस समय हमारे सीनियर होते थे। महबूब अख्तर सिद्दीकी। बहुत हंसमुख । मिलनसार। शायद छात्र यूनियन के सचिव भी थे। उनका साथी था नंदा । पूरा नाम याद नहीं। शायद एसएस नन्दा। महबूब भाई ने नऩ्दा से मजाक किया। कहा तेरा नेता बनने का इस समय बहुत मौका है। कॉलेज का परीक्षा केंद्र टूटा है। सब परेशान हैं। छात्रा और उनके अभिभावक सबसे ज्यादा तनाव में हैं। ऐसे में तू भूख हड़ताल कर दें। हम तेरे साथ हैं। दो तीन दिन की बात है। कॉलेज परीक्षा केंद्र बन ही जाना है। तू सबका हीरो बन जाएगा। एक बड़ा छात्र नेता। देख गुलजारी लाल नंदा प्रधान मंत्री रहे। ऐसे ही थ्रोड़े ही बने हैं। इन्होंने भी संघर्ष किया है। तू भी तो नंदा है।नंदा के दिमा्ग में बात घर कर गई। पुरानी बिल्डिंग में प्राचार्य कक्ष के बाहर ईंट रखीं थीं। शायद वे किसी निर्माण के लिए आई थीं। नंदा को माला पहनाकर उन्हीं पर बैठा दिया गया। कुछ ही देर में दो औार साथी श्याम सुंदर और रावेंद्र कुमार भी भूख हड़ताल पर बैठ गए। श्याम सुंदर का पूरा नाग शायद श्याम सुंदर शर्मा था।
सूचना पर देवेंद्र बक्शी आ गए। वे छात्र संघ के अध्यक्ष होते थे। शामियाना लग गया। छात्र संघ जिदांबाद, केंद्र नहीं रहेगा। कोई भी मजबूरी हो मांग हमारी पूरी हो ,के नारे कॉलेज में गूंजने लगे। केंद्र टूटने से प्राचार्य डा एसआर त्यागी भी क्षुब्ध थे। वे केंद्र टूटने को अपना अपमान मान रहे थे। त्यागी जी बहुत ही विद्वान प्राचार्य और कुशल प्रशासक भी थे।
उन्होंने छात्रों के आदोंलन से विश्वविद्यालय को अवगत कराया। कहा कि केंद्र तोड़कर सभी छात्र- छात्राओं को परीक्षा देने आगरा बुलाना गलत है। आप चाहें तो परीक्षा कराने के लिए बाहर का स्टाफ भेज सकतें हैं।
साथियों का संघर्ष रंग लाया। विश्व विद्यालय को अपना निर्णय बदलना पड़ा। आज नन्दा,श्याम सुंदर कहां हैं , पता नहीं। रावेंद्र जाटान में रहते थे,वे जरूर मिलते रहे। पता चला कि कई साल पहले उनका निधन हो गया।महबूब अख्तर सिद्दीकी बिजनौर कचहरी में वकालत करते हैं। उम्र ने हल्की सी उनकी कमर जरूर झुका दी किंतु आज भी पहले से ही मस्त हैं।
अशोक मधुंप
पूर्व छात्र
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