आजादी के अमृत महोत्सव से गायब हैं बख्त खान रूहेला
अशोक मधुप आजादी के अमृत महोत्सव में उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले का लाल किसी को याद नहीं। 1857 में दिल्ली से लेकर पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने वाले इस वीर को मौत भी मिली तो वतन से बहुत दूर। वहां जहां इसकी कुर्बानी को कोई याद करने वाला भी नहीं। कब्र पर जाकर कोई फूल चढ़ाने वाला भी नहीं। इसीपर बहादुर शाह जफर का एक शेर है− कितना है बदनसीब जफर दफन के लिए , दो गज जमीन भी न मिली कू ए यार में। 1857 की क्रांति का बड़ा नाम " साहेब-ए-आलम बहादुर" (लॉर्ड गवर्नर जनरल) जनरल बख्त खान है।वे इस क्रांति के यज्ञ में बरेली से आहुति देने निकले।उन्होंने दिल्ली में अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष का नेतृत्व किया। दिल्ली पतन के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी ।लखन ऊ और शाहजहांपुर में विद्रोही बलों में शामिल हो अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ते रहे। बख्त खान का जन्म बिजनौर के नजीबाबाद में हुआ था। बख्तखान रोहिल्ला पठान नजीबुदौला के भाई अब्दुल्ला खान के बेटे थे। 1817 के आसपास वे ईस्ट इंडिया कम्पनी में भर्ती हुए। पहले अफगान युद्ध में वे ...