बिजनौर के बांशिंदों ने सजाया और संवारा था लखनऊ
शायद ही कोई जानता हो कि बिजनौर के शेखजादों ने बिजनौर के साथ लखनऊ को सजाने और संवारने में भी बड़ा योगदान किया है। उत्तर प्रदेश सरकार के निशान में दो मछलियां भी बिजनौर की ही देन है।
बिजनौर के नहटौर के रहने वाले नाम शेख अब्दुर्रहीम को बादशाह अकबर ने अवध (लखनऊ) क्षेत्र में एक बड़ी जागीर भेंट की। शेख अब्दुल रहीम ने अपनी जागीर में लखनऊ में पहले अपनी बीवियों के लिए पांच महल बनवाए, जो पंचमहला नाम से जाने गए। फिर उन्हीं के हिस्से के तौर पर लक्ष्मण टीले के पास एक किला भी बनवाया। कारीगर लखना अहीर की कारीगरी को मान देने के लिए उसने उसका नाम ‘किला लखना’ रखा। बेहद चौड़ी दीवारों वाले इस किले में 26 मेहराबें (द्वार)थीं। इनमें हर मेहराब पर दो-दो मछलियां चित्रित थीं। इस कारण वह भी किसी आलीशान महल जैसा ही नजर आता था। 1766 के आस-पास शायद मेहराबों पर चित्रित मछलियों के ही कारण उसे मच्छी भवन कहा जाने लगा। अलबत्ता, उसमें शस्त्रागार भी था। उसका मुख्य दरवाजा शेखन दरवाजा कहलाता था। और जो भी पंचमहले की ओर जाना चाहता, उसे इस दरवाजे से गुजरना पड़ता था।
शेख अब्दुर्रहीम के वंशज ही आगे चलकर इतिहास में "शेखजादे" कहलाए। 18वीं शताब्दी में अवध के नवाबों (जैसे सआदत अली खान) का शासन स्थापित होने से पहले तक, पूरे लखनऊ और आस-पास के क्षेत्रों पर बिजनौर मूल के इन्हीं शेखजादों का नियंत्रण था। उस समय उनका दबदबा इतना ज्यादा था कि एक मशहूर कहावत बन गई थी- "जिसका मच्छी भवन, उसका लखनऊ।"
शेख अब्दुर रहीम बिजनौरी ने अपनी जिंदगी में ही नादान महल का निर्माण करवाया था । वसीयत की थी कि जब मेरा निधन हो तो मेरा मकबरा यहीं बनवाया जाए। बिजनौरी के निधन के बाद उनकी बेगम ने मुगल शैली में आगरा के लाल पत्थर से मकबरा बनवाया। इस पर खूबसूरत नक्काशी, बीच में एक बड़ा गुंबद मौजूद है जो बेहद आकर्षक है। इसी परिसर में उनके पिता शेख इब्राहीम का खंजर स्टोन (सफेद पत्थर) का मकबरा भी स्थापित है। शेख इब्राहीम अपने समय के बड़े सूफी सन्त थे। इस परिसर में लखौरी ईंट के दो अन्य चबूतरे भी बने हैं, जिन पर कुछ मजारात हैं।
शेख अब्दुर रहीम की मृत्यु के बाद भी उनका परिवार मुगल दरबार में प्रभावशाली बना रहा। उनके वंशजों को 'नहटौर के शेख' या वहां के रईस खानदानों के रूप में जाना गया। उनके वंशजों ने मुगल काल से लेकर ब्रिटिश काल तक प्रशासनिक और सैन्य भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने बिजनौर के नहटौर क्षेत्र में विशाल जागीरें संभाली,हालाँकि उनका मूल स्थान नहटौर था, लेकिन उनके परिवार का एक बड़ा हिस्सा लखनऊ में बस गया था। लखनऊ के पुराने इलाकों के विकास में इस परिवार का बड़ा हाथ रहा।
लखनऊ में स्थित 'मच्छी भवन' उस समय की स्थापत्य कला और शक्ति का प्रतीक था।इस भवन का नाम 'मच्छी भवन' इसलिए पड़ा क्योंकि इसके मुख्य द्वारों पर मछली के दो जोड़े (Emblem of Fish) अंकित थे। आगे चलकर 'मछली' का यह चिह्न अवध के नवाबों का आधिकारिक राजकीय प्रतीक (State Emblem) बन गया।बाद में अंग्रेजों ने 1918 में उत्तर प्रदेश सरकार के निशान मछली भवन की पहचान दो मछली ली। ये तीर कमान के साथ दो मछलियों का निशान उत्तर प्रदेश सरकार का चिंह है।
मछली भवन यह एक किलेनुमा संरचना थी। इसमें ऊँची दीवारें, बुर्ज और गहरे तहखाने थे। यह गोमती नदी के किनारे एक ऊँचे टीले पर स्थित था। इससे यहाँ से पूरे शहर पर नज़र रखी जा सकती थी। जब अवध के नवाबों (जैसे सआदत अली खान) ने अपनी राजधानी फैजाबाद से लखनऊ बदली तो उन्होंने इसी मच्छी भवन को अपना मुख्य निवास बनाया और इसका विस्तार किया।1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, अंग्रेजों ने इस भवन का उपयोग एक सैन्य अड्डे के रूप में किया था। विद्रोह के दौरान इसे भारी नुकसान पहुँचा और बाद में सुरक्षा कारणों से अंग्रेजों ने इसे काफी हद तक ध्वस्त कर दिया। शेख अब्दुर रहीम द्वारा निर्मित संरचनाओं में भारतीय और मुगल शैली का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता था। उन्होंने लखनऊ को एक छोटे कस्बे से एक प्रशासनिक केंद्र में बदलने की नींव रखी थी। आज जहाँ लखनऊ की प्रसिद्ध 'लक्ष्मण टीला' मस्जिद और उसके आस-पास का क्षेत्र है, वहीं कभी मच्छी भवन का विशाल परिसर फैला हुआ है।अब यहां मेडिकल कॉलेज हैं।यह मछली का प्रतीक इतना प्रभावशाली था कि बाद में यह अवध की पूरी संस्कृति और नवाबों के राजचिह्न का प्रमुख हिस्सा बन गया । यही जुड़वा मछलियां आज भी उत्तर प्रदेश सरकार के राजकीय चिह्न में देखी जा सकती हैं।
बिजनौर के नहटौर के रहने वाले नाम शेख अब्दुर्रहीम को बादशाह अकबर ने अवध (लखनऊ) क्षेत्र में एक बड़ी जागीर भेंट की। शेख अब्दुल रहीम ने अपनी जागीर में लखनऊ में पहले अपनी बीवियों के लिए पांच महल बनवाए, जो पंचमहला नाम से जाने गए। फिर उन्हीं के हिस्से के तौर पर लक्ष्मण टीले के पास एक किला भी बनवाया। कारीगर लखना अहीर की कारीगरी को मान देने के लिए उसने उसका नाम ‘किला लखना’ रखा। बेहद चौड़ी दीवारों वाले इस किले में 26 मेहराबें (द्वार)थीं। इनमें हर मेहराब पर दो-दो मछलियां चित्रित थीं। इस कारण वह भी किसी आलीशान महल जैसा ही नजर आता था। 1766 के आस-पास शायद मेहराबों पर चित्रित मछलियों के ही कारण उसे मच्छी भवन कहा जाने लगा। अलबत्ता, उसमें शस्त्रागार भी था। उसका मुख्य दरवाजा शेखन दरवाजा कहलाता था। और जो भी पंचमहले की ओर जाना चाहता, उसे इस दरवाजे से गुजरना पड़ता था।
शेख अब्दुर्रहीम के वंशज ही आगे चलकर इतिहास में "शेखजादे" कहलाए। 18वीं शताब्दी में अवध के नवाबों (जैसे सआदत अली खान) का शासन स्थापित होने से पहले तक, पूरे लखनऊ और आस-पास के क्षेत्रों पर बिजनौर मूल के इन्हीं शेखजादों का नियंत्रण था। उस समय उनका दबदबा इतना ज्यादा था कि एक मशहूर कहावत बन गई थी- "जिसका मच्छी भवन, उसका लखनऊ।"
शेख अब्दुर रहीम बिजनौरी ने अपनी जिंदगी में ही नादान महल का निर्माण करवाया था । वसीयत की थी कि जब मेरा निधन हो तो मेरा मकबरा यहीं बनवाया जाए। बिजनौरी के निधन के बाद उनकी बेगम ने मुगल शैली में आगरा के लाल पत्थर से मकबरा बनवाया। इस पर खूबसूरत नक्काशी, बीच में एक बड़ा गुंबद मौजूद है जो बेहद आकर्षक है। इसी परिसर में उनके पिता शेख इब्राहीम का खंजर स्टोन (सफेद पत्थर) का मकबरा भी स्थापित है। शेख इब्राहीम अपने समय के बड़े सूफी सन्त थे। इस परिसर में लखौरी ईंट के दो अन्य चबूतरे भी बने हैं, जिन पर कुछ मजारात हैं।
शेख अब्दुर रहीम की मृत्यु के बाद भी उनका परिवार मुगल दरबार में प्रभावशाली बना रहा। उनके वंशजों को 'नहटौर के शेख' या वहां के रईस खानदानों के रूप में जाना गया। उनके वंशजों ने मुगल काल से लेकर ब्रिटिश काल तक प्रशासनिक और सैन्य भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने बिजनौर के नहटौर क्षेत्र में विशाल जागीरें संभाली,हालाँकि उनका मूल स्थान नहटौर था, लेकिन उनके परिवार का एक बड़ा हिस्सा लखनऊ में बस गया था। लखनऊ के पुराने इलाकों के विकास में इस परिवार का बड़ा हाथ रहा।
लखनऊ में स्थित 'मच्छी भवन' उस समय की स्थापत्य कला और शक्ति का प्रतीक था।इस भवन का नाम 'मच्छी भवन' इसलिए पड़ा क्योंकि इसके मुख्य द्वारों पर मछली के दो जोड़े (Emblem of Fish) अंकित थे। आगे चलकर 'मछली' का यह चिह्न अवध के नवाबों का आधिकारिक राजकीय प्रतीक (State Emblem) बन गया।बाद में अंग्रेजों ने 1918 में उत्तर प्रदेश सरकार के निशान मछली भवन की पहचान दो मछली ली। ये तीर कमान के साथ दो मछलियों का निशान उत्तर प्रदेश सरकार का चिंह है।
मछली भवन यह एक किलेनुमा संरचना थी। इसमें ऊँची दीवारें, बुर्ज और गहरे तहखाने थे। यह गोमती नदी के किनारे एक ऊँचे टीले पर स्थित था। इससे यहाँ से पूरे शहर पर नज़र रखी जा सकती थी। जब अवध के नवाबों (जैसे सआदत अली खान) ने अपनी राजधानी फैजाबाद से लखनऊ बदली तो उन्होंने इसी मच्छी भवन को अपना मुख्य निवास बनाया और इसका विस्तार किया।1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, अंग्रेजों ने इस भवन का उपयोग एक सैन्य अड्डे के रूप में किया था। विद्रोह के दौरान इसे भारी नुकसान पहुँचा और बाद में सुरक्षा कारणों से अंग्रेजों ने इसे काफी हद तक ध्वस्त कर दिया। शेख अब्दुर रहीम द्वारा निर्मित संरचनाओं में भारतीय और मुगल शैली का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता था। उन्होंने लखनऊ को एक छोटे कस्बे से एक प्रशासनिक केंद्र में बदलने की नींव रखी थी। आज जहाँ लखनऊ की प्रसिद्ध 'लक्ष्मण टीला' मस्जिद और उसके आस-पास का क्षेत्र है, वहीं कभी मच्छी भवन का विशाल परिसर फैला हुआ है।अब यहां मेडिकल कॉलेज हैं।यह मछली का प्रतीक इतना प्रभावशाली था कि बाद में यह अवध की पूरी संस्कृति और नवाबों के राजचिह्न का प्रमुख हिस्सा बन गया । यही जुड़वा मछलियां आज भी उत्तर प्रदेश सरकार के राजकीय चिह्न में देखी जा सकती हैं।
अशोक मधुप 15 सिंतबर 2026 अमर उजाला

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