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द्वितीय विश्व युत्र के लिए बिजनौर ने खरीदा था हवाई जहाज

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द्वितीय विश्व युत्र के लिए बिजनौर ने खरीदा था हवाई जहाज हवाई जहाज का नाम भी बिजनौर रखा गया बिजनौर वासी जानते भी नही कि कभी बिजनौर जिला प्रशासन ने युद्ध के लिए एक विमान खरीदा था। इस विमान का नाम भी बिजनौर ही था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पूरे देश ने सरकार को रक्षा सामग्री,सैनिक और युद्धक सामग्री लेने के लिए जी खोलकर दान किया। बिजनौर ने भी इसमें बढ़ चढ़कर कर योगदान किया । युद्ध से जुड़े कार्यों के मदद के मामले में 'यूनाइटेड प्रॉविंस' (संयुक्त प्रांत) के 48 जनपदों में बिजनौर ने सातवां स्थान हासिल किया है। 1940 में, बिजनौर ने सार्वजनिक चंदे से 'यू. पी. स्क्वाड्रन' को एक 'स्पिरिटफायर' लड़ाकू विमान उपहार में दिया था। इसे ब्रिटिश युद्ध कैबिनेट के तत्कालीन सदस्य लॉर्ड बीवरब्रुक ने आभार के साथ स्वीकार किया । बिजनौर जिले के नाम पर इस विमान का नाम बिजनौर रखकर जिले को सम्मान दिया था। युद्ध के दौरान बिजनौर जनपद से कुल मिलाकर 3,503 लड़ाकू और गैर-लड़ाकू रंगरूटों (सैनिकों) की आपूर्ति की गई थी। रक्षा बचत में 79,21,009 रुपये की राशि का योगदान दिया गया । महामहिम (एचई) के युद्ध ...

बिजनौर के बांशिंदों ने सजाया और संवारा था लखनऊ

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शायद ही कोई जानता हो कि बिजनौर के शेखजादों ने बिजनौर के साथ लखनऊ को सजाने और संवारने में भी बड़ा योगदान किया है। उत्तर प्रदेश सरकार के निशान में दो मछलियां भी बिजनौर की ही देन है। बिजनौर के नहटौर के रहने वाले नाम शेख अब्दुर्रहीम को बादशाह अकबर ने अवध (लखनऊ) क्षेत्र में एक बड़ी जागीर भेंट की। शेख अब्दुल रहीम ने अपनी जागीर में लखनऊ में पहले अपनी बीवियों के लिए पांच महल बनवाए, जो पंचमहला नाम से जाने गए। फिर उन्हीं के हिस्से के तौर पर लक्ष्मण टीले के पास एक किला भी बनवाया। कारीगर लखना अहीर की कारीगरी को मान देने के लिए उसने उसका नाम ‘किला लखना’ रखा। बेहद चौड़ी दीवारों वाले इस किले में 26 मेहराबें (द्वार)थीं। इनमें हर मेहराब पर दो-दो मछलियां चित्रित थीं। इस कारण वह भी किसी आलीशान महल जैसा ही नजर आता था। 1766 के आस-पास शायद मेहराबों पर चित्रित मछलियों के ही कारण उसे मच्छी भवन कहा जाने लगा। अलबत्ता, उसमें शस्त्रागार भी था। उसका मुख्य दरवाजा शेखन दरवाजा कहलाता था। और जो भी पंचमहले की ओर जाना चाहता, उसे इस दरवाजे से गुजरना पड़ता था। शेख अब्दुर्रहीम के वंशज ही आगे चलकर इतिहास में "शेखजादे...

बिजनौर की एक मां−बेटी को कला के क्षेत्र में मिला में पद्श्री सम्मान

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बिजनौर की एक मां−बेटी को कला के क्षेत्र में मिला में पद्श्री सम्मान बिजनौर प्रतिभाओं की भूमि है। बिजनौर की एक मां −बेटी ने कला के क्षेत्र में इतना काम किया कि भारत सरकार ने दोनों को पद्मश्री देकर सम्मानित किया। सुमित्रा चरत राम (17 नवंबर 1914 – 8 अगस्त 2011) एक प्रतिष्ठित भारतीय कला संरक्षक थीं। सुमित्रा जी का विवाह उद्योगपति लाला चरत राम से हुआ था, जो डीसीएम श्रीराम समूह के संस्थापक थे। इन्होंने स्वतंत्रता के बाद भारत में प्रदर्शन कलाओं के पुनर्जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने 1952 में श्रीराम भारतीय कला केंद्र (SBKK) की स्थापना की, जो आज भी भारतीय शास्त्रीय संगीत, नृत्य और रंगमंच के प्रचार-प्रसार में अग्रणी संस्था है। सुमित्रा देवी का जन्म 17 नवंबर 1914 को दिल्ली में हुआ। वे बिजनौर निवासी राजा ज्वाला प्रसाद की छोटी  बेटी थीं। इनकी माता का नाम भाग्यवती देवी था। सुमित्रा देवी ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा ग्रहण की। सुमित्रा देवी को बचपन से ही कला, म्यूजिक एवं शिक्षा में भारी लगाव था। 1947 में, रवि शंकर के सुझाव पर, उन्होंने अपने ससुर से ₹10,हजार का ऋण ल...

दो बार राज्य सभा सदस्य रहे शेरकोट के डॉ. जगदीश प्रसाद माथुर

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  दो बार राज्य सभा सदस्य रहे शेरकोट के डॉ. जगदीश प्रसाद माथुर भाजपा को अपना पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले डॉक्टर जगदीश प्रसाद माथुर का जन्म नौ नवंबर 1921 को जनपद बिजनौर के शेरकोट नगर में महावीर प्रसाद के घर में हुआ । उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की । 1942 में वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े । 1945 में आरएसएस के प्रचारक बन गए । 1952 में भारतीय जनसंघ के सदस्य बने और बरेली के संभागीय सचिव बनाए गए । उसके बाद वह केंद्रीय कार्यालय में सचिव रहे। राष्ट्र सचिव का पद उन्हें मिला । राष्ट्रीय कार्यकारिणी के आमंत्रित सदस्यों में भाजपा ने उन्हें शामिल किया। वे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और उपाध्यक्ष रहे। पार्टी के आदेश पर राष्ट्रीय प्रवक्ता का पद उन्होंने ग्रहण किया । वे पूर्वोत्तर राज्य बिहार− जम्मू और कश्मीर तथा राजस्थान के पार्टी मामलों के प्रभारी बनाए गए । 1993 में भी राज्यसभा में भाजपा सदस्य दल के उपनेता बने । एक सांसद के रूप में उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी । वह अप्रैल 1978 और फिर अप्रैल 1990 में राज्यसभा के लिए चुने गए । 1990 में मुख्य सचेतक भी रहे। एक सामाजिक और राजनीतिक क...

बिजनौर के धर्मेंद्र त्यागी की देन है परिवार कल्याण का लाल तिकोन

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बिजनौर जनपद का रतनगढ़ एक एतिहासिक गांव है। इस गांव ने देश को कई प्रतिभाएं दी । देश के परिवार कल्याण कार्यक्रम को लाल तिकोन देने वाले धर्मेंद्र त्यागी−देव त्यागी उर्फ डीके त्यागी इसी रतनगढ़ की संतान हैं। रतनगढ़ की स्थापना उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में राव जोखा सिंह त्यागी ने की थी। वे मराठा संघ सेना की उत्तरी शाखा के पूर्व सेनापति (या राव ) थे । इनका नियंत्रण हिमालय की तराई घाटियों तक फैला हुआ था। दिल्ली के युद्ध में मराठों के पतन के बाद, वे एक भाड़े के साहसी सैनिक बन गए। कुछ समय तक उन्होंने मेरठ के पास स्थित सरधना रियासत के सेनापति ( सिपहसलार ) के रूप में कार्य किया । इनके परिवार वाले बताते हैं कि सरधना की बेगम समरू के नाराज होने पर इन्होंने सरधना छोड़ दिया। पहले बुलंदशहर गए। बाद में राम जोखा सिंह रतनगढ़ आ गए। उन्होंने ही रतनगढ़ की स्थापना की। नूरपुर के निवासी धर्मेंद्र त्यागी 1950 के आसपास भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में डाइरेक्टर बने। 1950 और 1960 के दशक में लोगों को परिवार नियोजन के प्रति जागरूक करना सबसे मुश्किल काम था । उन्होंने अपने नारों, प्लानिंग और सिंबल से देशभर...

सिमी आंतकी

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महिलाओं का ईदगाह

 सबसे अलग ईद पर मुस्लिम समाज के पुरूष ही ईदगाह पर जाते ओर नमाज अदा करते हैं। किंतु  उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद के चांदपुर कस्बे में एक ऐसा ईदगाह भी है, जहां सिर्फ  मुस्लिम महिलाएं ही ईद पर नमाज अदा करती हैं। खास बात यह है कि इस ईदगाह के बारे में बिजनौर जनपद के  ही बड़ी संख्या में रहने वालों को जानकारी नही हैं।  चंादपुर से बास्टा जाने वाले मार्ग पर स्थित यह ईदगाह नया नहीं है। सौ साल से ज्यादा पुराना है। इसमें छोटी  ईंट का बना कुंआ है, जो इसकी प्राचीनता बताने के लिए काफी है। ईदगाह में लगे पेड़ ही काफी प्राचीन है। ईदगाह के संचालक  शाहबुुद्दीन बतातें है कि ईदगाह का नाम अहले हदीस है और यह सौ  साल से भी ज्यादा पुराना है। वे बताते है कि ईदगाद ढ़ाई बीघा जमीन में स्थित हैं। ईद से क ई दिन पहले कमेटी ईदगाह की सफाई कराती है। ईद से एक दिन पूर्व ईदगाह के चारों ओर  कनात लगवाई जाती  हंै।  इन कनातों के पीछे महिलांए नमाज अदा करती हैं। कनात इसलिए लगवाई जाती है कि महिलांए नवाज के समय पुरूषों के सामने न आए और पर्दा  बना रहे। वे बताते हैं कि उनके ह...

विश्व के अजूबों से कम नहीं कालागढ़ डेम

 सबसे अलग विश्व के अजूबों से कम नहीं कालागढ़ डेम  उत्तरांचल का रामगंगा नदी पर बना कालागढ़ का डेम  विश्व के प्रसिद्ध अजूबों  जैसा ही है। इसे एशिया का सबसे बड़ा मिट्टी का डेम होने का सौभाग्य प्राप्त है। डेम एरिया में मैसूर के काबेरी नदी पर बने   वृंदावन गार्डन की तर्ज  पर विकसित शानदार उद्यान  भी है। कालागढ़ से कार्बेट में प्रवेश के लिए एक गेट भी है। इस गेट से प्रवेश कर कार्बेट के वन्य प्राणियों का भी आसानी से अवलोकन किया जा सकता है। यहां से कंडी मार्ग  से एक और कोटद्वार तो दूसरी ओर रामनगर भी जाया  जा सकता है।  शिवालिक पहाडिय़ां पर्यटकों को सदैव अपनी और आकर्षित करती रही हैँ। दिल्ली से लगभग २५० किलो मीटर की दूरी पर  रामगंगा के तट  कालागढ़ स्थित है। दिल्ली से मेरठ बिजनौर होकर लगभग पांच घंटे में कालागढ़ पंहुचा जा सकता है। कालागढ़ में सिंचाई  विभाग के कुछ रेस्ट हाउस और प्रशिक्षण केंद्र हैं। डेम बनने के समय कर्मचारियों और अधिकरियों के लिए कुछ कालोनी बनी थी। रिजर्व  वन होने के कारण डेम बनने के  बाद कालागढ़ की भूमि का...

एक जरा सा मजाक

  एक संस्मरण एक जरा सी मजाक अशोक मधुप मजाक -मजाक ही होती है। हल्की फुल्की। मौज मस्ती की। किंतु कई  बार मजाक गंभीर भी हो जाती हैं। ऐसी मजाक इतिहास बनती हैं।  एक ऐसी  मजाक मेरे वर्धमान कॉलेज की पढ़ाई के दौरान हुई। वह मजाक कालचक्र पर अपने निशान बना गई। कॉलेज  इस मजाक और उसके योगदान को कभी नहीं भुला पाएगा । सऩ 19 68 में मैंने  वर्धमान कॉलेज में बीए में प्रवेश लिया।कुछ दिन ठीक ठाक चला। इंटर मैंने प्राइवेट किया था। हाईस्कूल रेगुलर था। इसके तीन साल के बाद का ये माहौल बिल्कुल नया था। सुखद- आनन्ददायी । दस बजे के बाद कक्षांए होतीं। मैं झालू का रहने वाला हूूू। हम झालू - हल्दौर के साथी सवेरे ट्रेन से बिजनौर आते । शाम को ट्रेन से अपने घर झालू चल जाते। तब तक झालू से बिजनौर का रास्ता कच्चा था। आने जाने का ट्रेन के अलावा कोई और साधन न था। दस से चार बजे तक क्लास होतीं।  उसके बाद खाली। ट्रेन शाम छह बजे थी। सो इतने शहर घूमना। मौज मस्ती करना ही रहता। कॉलेज में नए दोस्त बन रहे थे। मैं भी देहात के  माहौल से निकल कर शहर में ढलने में लगा था। एक दिन पता चला कि अपने कॉलेज...

श्री जंभेश्वर तपोवन आश्रम धाम पर 18 को विश्श्नोई समाज करेगा पूजा − अर्चन

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श्री जंभेश्वर तपोवन आश्रम धाम पर 18 को  विश्श्नोई  समाज करेगा पूजा − अर्चन बिजनौर मंडावर मार्ग पर  मुहम्मदपुर देवमल  में विश्नोईयों का  मंदिर है। मंदिर गांव  से लगभग छह−सात  किलो मीटर दूर जंगल में हैं। यहां प्रत्येक साल होली के बाद चेत्र  अमावस्या को मेला  लगता है। इस बार चैत्र  अमावस्या 18 मार्च की है। जिले से बड़ी तादाद में श्रद्धालू  यहां  आते। गुरू श्री जंभेश्वर महाराज जी द्वारा लगाए खेजड़ी वृक्ष पर श्रद्धालु     कलावा बांधकर अपनी मन्नतें मांगते है । सवेरे हवन होता है। उसके बाद श्रद्धालुओं के लिए भंडारा होता  है । श्रद्धालु   भंडारे में प्रसाद ग्रहण करते हैं । कुछ यहां गुरू  जी के कथनानुसार पौधे भी रोपतें  हैं। मान्यता है कि श्री जंभेश्वर महाराज राजस्थान के समराथल धोरा से चलकर नदी किनारे मोहम्मदपुर देवमल के जंगल में अपनी जमात के साथ सन 1533 ई. में आकर यहां रुके। तब यह वन क्षेत्र था। यह स्थान नदी किनारे होता था। गुरु महाराज ने अपने  रूकने के दौरान यहां अपने हाथों से खेजड़ी का वृक्...

बिजनौर में हैं बिल्लोच के 26 गांव

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बरमपुर, जहां स्वर्गारोहण को जाते पांडव दस दिन रूके

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  बरमपुर, जहां स्वर्गारोहण को जाते पांडव दस दिन रूके अशोक मधुप वरिष्ठ पत्रकार बिजनौर जनपद का आज का गांव बरमपुर का बहुत ही एतिहासिक है, इसके बावजूद ये आज तक इतिहास में जगह नही बना पाया।जनपदवासी ये भी नही जानते कि यहां कभी पांडवों के कुल गुरू कृपाचार्य का आश्रम था।  जानकारों के अनुसार बरमपुर का पौराणिक नाम ब्रह्मपुर  है। यहां  वैदिक काल में   ब्रह्मऋषि   आश्रम था। ब्रह्मपुर बोलचाल की भाषा में बरमपुर हो गया।  बरमपुर के प्रसिद्ध विद्वान यशपाल सिंह आर्य के अनुसार बरमपुर फारसी भाषा का शब्द है। उर्दू और फारसी में ब्रह्मपुर नमो  न लिखा जा सकता है और नहीं बोला जा सकता है । 15 ईसवीं में इस क्षेत्र पर मुगलों का पूर्ण अधिपत्य स्थापित हो गया। उसके   बाद ब्रह्मपुर को बरमपुर बोलना शुरू किया । मान्यता है कि महाभारत काल में यहां हस्तिनापुर राज परिवार के राज गुरु कृपाचार्य का आश्रम था। यह आश्रम जनपद बिजनौर उत्तर प्रदेश जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर उत्तर दिशा में तथा नजीबाबाद तहसील मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर पश्चिम दक्षिण दिशा में ...

बिजनौर के साथ आश्चर्य में एक है एजाज अली हाल

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--- बिजनौर के सात आश्चर्य में एक है एजाज अली हाँल अशोक मधुप  बिजनौर के पुराने निवासी बिजनौर शहर के सात आश्चर्य  बताते रहे हैं। बिजनौर नगर पालिका जिस एजाज अली हाल को गिराकर  व्यवसायिक काम्पलैक्स बनाना चाहती है। यह एजाज अली हाल भी उन सात आश्चर्य में से एक है। 1−बिजनौर के सात आश्चर्य हैं बिना स्टेट का राजा( राजा  ज्वाला प्रसाद)ये देश के पहले अभियंता हुए। ब्रिटिश सरकार ने इन्हें राजा  का खिताब दिया।  खिताब तो मिल गया किंतु इनकी कोई  स्टेट नही थी। इसीलिए ये बिना स्टेट के राजा कहलाए। बिजनौरवासी इन्हें बिना स्टेट का राजा कहते थे। बिना स्टेट का राजा होने के कारण  ये बिजनौर के सात आश्चर्य  में पहले नंबर के आश्चर्य में आते थे। 2−खोखरा पांउड या खोखरा तालाब−  आज के प्रदर्शनी मैदान से इंदिरा पांर्क तक का भाग खोखरा तालाब या   खोखरा पाउंड( बिना  पानी का तालाब कहा जाता  है)।  इस स्थान की विशेषता ये है कि इसमें कितना भी पानी भरे दो, कुछ ही घंटो में जमीन में चला जाता है।पानी के जमीन में चले जाने के कारण ये खोखरा तालाब नाम से प्रसि...

हरिद्वार कुंभ में जब तैमूर लंग ने किया था कत्ले आम 30 जनवरी 2025

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अशोक मधुप वरिष्ठ पत्रकार आज से लगभग 627 साल पहले तैमूर लंग ने हरिद्वार कुंभ में बुरी तरह कत्ले आम किया था। तैमूर ने  कुंभ में आए 4282 श्रद्धालुओं को मार डाला था। यह कत्ले आम देख  नागा सन्यासी उसके मुकाबले के लिए आएं।इन नागा संयासियों ने तैमूर लंग के 3500 खूंखार लडाके मार डाले। उधर जाटों की खाप पचांयत की सेना भी मेरठ से तैमूर का पीछाकर रही थी। उसने हरिद्वार के पास पथरी में तैमूर का मुकाबला किया  और भारी तबाही मचाई ।अपने खेमें में भारी तबाही मचता देख यहां से तैमूर लंग दुम दबाकर भागा और 17 मार्च को कांगड़ा पंहुच गया।   तैमूर लंग ने मार्च सन् 1398 ई में भारत पर 92 हजार  घुड़सवारों की सेना से  आक्रमण किया । दिल्ली में लूटमार और कत्ले आम कर वह मेरठ  पंहुचा। मेरठ के किलेदार इलियास को हराकर तैमूर ने मेरठ में भी तकरीबन 30 हज़ार हिंदुओं को मारा।यह सब करने में उसे महज़ तीन महीने लगे। इस बीच वह दिल्ली में केवल 15 दिन और मेरठ में एक सप्ताह  रहा।तैमूर का मकसद केवल भारत को लूटना था, इसलिए वह वापस अपने देश लौट गया। दिसंबर 1398 में  तैमूर दिल्ली के पास प...